Sunday, 15 June 2014

मजबूरी


"मजबूरी के मौसम में भी जीना पड़ता है 
थोड़ा सा समझौता जानम करना  पड़ता है" 

"कभी कभी कुछ इस हद तक बड़ जाती है लाचारी 
लगता है ये जीवन जैसे बोझ हो कोई भारी 
दिल कहता है रोएं लेकिन हसना पड़ता है "

"कभी कभी इतनी धुँधली हो जाती हैं तस्वीरें 
पता नहीं चलता क़दमों में कितनी  है ज़ंजीरें 
पाँव बंधे होते है लेकिन चलना पड़ता है "

"रूठ के जाने वाला बादल टूटने वाला तारा 
किसको खबर किन लम्हों में बन जाए कौन सहारा 
दुनिया जैसी भी हो रिश्ता रखना पड़ता है" 

मजबूरी के मौसम में भी जीना पड़ता है 
थोड़ा सा समझौता जानम करना  पड़ता है 













Monday, 12 May 2014

अँधेरे


"रातों में  गर न अश्क बहाऊँ  तो क्या करूँ 
इक पल भी उसको भूल न पाऊँ तो क्या करुँ "

"मैंने सुना है उनको अँधेरे नहीं पसंद 
राहों में अब  मै दिल न जलाऊँ तो क्या करुँ"

"तुम्ही कहो कि छोड़ दे जब ज़िन्दगी भी साथ
फिर मौत को गले न लगाऊँ तो क्या करुँ "

"सोचा तो था कि छोङ दू उसकी  गली मुराद 
लेकिन कही करार न पाउँ तो कया  करुँ"    










Saturday, 19 April 2014

मुजरिम


"अपनी आँखों के समुन्दर में उतर  जाने दो 
  तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दो" 

"ऐ नए दोस्त मैं समझूंगा तुझे भी अपना 

  पहले माज़ी का कोई ज़ख्म तो भर जाने दो" 

"आग दुनिया की लगाई हुई बुझ जायेगी 

 कोई आंसू मेरे दामन पर बिखर जाने दो"

"ज़ख्म कितने तेरी चाहत से मिले हैं मुझको 

 सोचता हूँ कि कहूँ तुझसे मगर जाने दो"