"अम्न का जो पैग़ाम सुनाने वाले हैं वो गलियों में आग लगाने वाले हैँ " "तुम ले जाओ अपनी नेज़ा ,खंजर और तलवार, हम तो सिर्फ प्यार मोहब्बत बाटने वाले हैं" "ज़ुल्म के काले बादल से डरना कैसा , ये मौसम तो आने जाने वाले हैं " "आम आदमी का अब तो ख़ुदा ही है हाफ़िज़ सारे मसीहा नफरत का ज़हर पिलाने वाले हैं" "माल बनाने वाले तो सब है लेकिन सोचो अब कितने ईमान बचाने वाले है"
|
Saturday, 11 October 2014
पैग़ाम
Saturday, 4 October 2014
Sunday, 15 June 2014
मजबूरी
"मजबूरी के मौसम में भी जीना पड़ता है
थोड़ा सा समझौता जानम करना पड़ता है"
"कभी कभी कुछ इस हद तक बड़ जाती है लाचारी
लगता है ये जीवन जैसे बोझ हो कोई भारी
दिल कहता है रोएं लेकिन हसना पड़ता है "
"कभी कभी इतनी धुँधली हो जाती हैं तस्वीरें
पता नहीं चलता क़दमों में कितनी है ज़ंजीरें
पाँव बंधे होते है लेकिन चलना पड़ता है "
"रूठ के जाने वाला बादल टूटने वाला तारा
किसको खबर किन लम्हों में बन जाए कौन सहारा
दुनिया जैसी भी हो रिश्ता रखना पड़ता है"
मजबूरी के मौसम में भी जीना पड़ता है
मजबूरी के मौसम में भी जीना पड़ता है
थोड़ा सा समझौता जानम करना पड़ता है
Subscribe to:
Posts (Atom)


